तुम कहती हो कि मैं क्या हूँ?
और मैं कहता हूँ कि तुम तुम हो,
तुम्हें ज़रूरत नहीं कुछ और होने की.
जो कुछ हो जाते हैं वो खुद नहीं रहते,
और मुझे तुम तुम जैसी ही पसंद हो,
कुछ और जैसी नहीं.
तुम कहती हो कि मैं ऐसी हूँ और ऐसा तुम्हें नहीं चाहिए,
और मैं कहता हूँ कि मुझे तुम चाहिए
और जैसी हो वैसी ही चाहिए.
तुम कहती हो कि तुम्हारा भूगोल गलत है,
और मैं कहता हूँ कि तुम्हारा भूगोल
मेरे भूगोल को चाहिए,
और दोनों को साथ बैठ कर एक दूसरे की
असमानतायें गिननी चाहिए
और खुश होना चाहिए उन्हें मिलता देख कर.
तुम कहती हो कि तुम्हें बातें बनाना आता है
और मैं कहता हूँ कि तुम्हें मुझे बनाना आता है,
और मुझे बना कर तुम खुद कुछ देर के लिए जो बन जाती हो,
मुझे वही तुम चाहिये...
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