Tuesday, 20 August 2019

तुम

रात पानी बरसा मटके भर
बूँदें गिर रहीं थीं ढेरम-ढेर
जागा रहा मैं बाहर देखता सुबह तक...

रोशनी थी लकीर भर आसमान की
नमी, हवा, बिजली, शोर,
सब था

बस एक तुम नहीं थी...

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