Sunday, 14 April 2019

तुम्हारे हक़ की कविताएँ


सुबह हो चुकी है
और कविताएँ सब ख़तम,

अब कहने को कुछ नहीं रह गया है,
जो भी था
कविताओं में कहा जा चुका है,
अब बस चुप्पी बची है.

कवि लड़की को देखते देखते मुस्कुराता है.
लड़की उदास है,
शायद कविताओं के ख़त्म हो जाने से या रात के बीत जाने से.

लड़की उठती है,
उसे जाना है.
"कुछ देर और नहीं रुक सकती?"
कवि पूछता है.

'रात तुम्हारी थी, वो बीत गयी"
लड़की कहती है और अपना पर्स उठाती है.

कवि मुस्कुराता है,
एक अकेली, उदास मुस्कान.
उसे पता था, सुबह तो होनी ही होती है.

लड़की मुडती है,
मुस्कुराने की कोशिश करती है.
कवि देख नहीं पाता,
वो नीचे देखने लगता है.

लड़की धीरे से बाहर निकल जाती है.

कवि उठता है,
और सब कविताएँ उठा कर पानी में डाल देता है.
नीली स्याही रेशा रेशा घुल कर शफ्फाक़ पानी में खो जाती है.

वो कविताएँ सिर्फ उस लड़की के लिए लिखी गयी थीं,
बाकी दुनिया का उन पर कोई हक़ नहीं बनता था...