तुम्हारे क़दम चूम लें हम
तब शायद रुक जाओ तुम,
ना बरबाद करना चाहो
हमारे लबों के गीले निशान,
कि गोल चक्कर लेती पृथ्वी
रुक गयी है
सुनने को आंसू तुम्हारे,
सिसकियाँ पढ़ के तुम्हारी
रात ज़िद पकड़ के बैठ गयी है
ना जाने की,
तुम बोल दो
तो शायद सुबह हो जाये,
नर्म उंगलियाँ तुम्हारी
पकड़कर
रख लें हम अपनी पलकों पर,
तब सहलाते हुए माथा मेरा
शायद रुक जाओ तुम...
तब शायद रुक जाओ तुम,
ना बरबाद करना चाहो
हमारे लबों के गीले निशान,
कि गोल चक्कर लेती पृथ्वी
रुक गयी है
सुनने को आंसू तुम्हारे,
सिसकियाँ पढ़ के तुम्हारी
रात ज़िद पकड़ के बैठ गयी है
ना जाने की,
तुम बोल दो
तो शायद सुबह हो जाये,
नर्म उंगलियाँ तुम्हारी
पकड़कर
रख लें हम अपनी पलकों पर,
तब सहलाते हुए माथा मेरा
शायद रुक जाओ तुम...
No comments:
Post a Comment