Sunday, 27 January 2019

प्रेम का हिसाब

गीली सफ़ेद बर्फ से लिपटे चिनारों के चेहरे
खरगोश की आँखों जैसे मुंदे पड़े थे,
उतने ही लुभावने
जितना वो सेब रहा होगा जिसे हव्वा ने खाया था,
लाल चमकता अकेलापन
या
अभी शाम को झरी मुरझाई सूखी पत्तियाँ,
और सन्नाटा चीख चीख कर जाने किसे बुला रहा था

पीली अंधियारी रोशनी,
और बारिश की नम बूँदें,
और शोर मचाती हवा,
और वो आम जैसा बादल का टुकड़ा,
ऐसा क्यों है कि तुम्हारे चेहरे के ही हिस्से लगते हैं सब

रेगिस्तान में कोई नहर जैसे,
या बच्चों के रंगीन गुब्बारे,
या फांसी का फंदा लिए खड़ा जल्लाद कोई,
जगह ही जगह है पन्ने के दोनों तरफ.
और हाशिये में लिखे दो शब्द,
क़त्ल कर दिए जायें अगर ये सब
तब भी जो बचा रहता है वो तुम हो

रोना क्या है,
क्या वही जो हँसी और धुएं के बीच की खाली जगह में पनपता है?
अगर गणित में से निकाल दिया जाये जोड़-घटाव
तो जो बचता है वो क्या है?

दरअसल वो तुम हो,
एक हथेली भर मुस्कान लिए
हाथ बढ़ाती हुयी,

हाँ शायद तुम ही हो

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