Monday, 30 September 2019

जब आये तुम

आना तुम्हारा सर्दियों की धूप सा,
नरमी बन कर मेरे पोरों में समा जाना है...

आना तुम्हारा

तुम आई
शाम की तरह
चुपचाप, दबे पाँव
बिखर गयी आँगन में रात बन कर...

Tuesday, 20 August 2019

तुम

रात पानी बरसा मटके भर
बूँदें गिर रहीं थीं ढेरम-ढेर
जागा रहा मैं बाहर देखता सुबह तक...

रोशनी थी लकीर भर आसमान की
नमी, हवा, बिजली, शोर,
सब था

बस एक तुम नहीं थी...

Sunday, 14 April 2019

तुम्हारे हक़ की कविताएँ


सुबह हो चुकी है
और कविताएँ सब ख़तम,

अब कहने को कुछ नहीं रह गया है,
जो भी था
कविताओं में कहा जा चुका है,
अब बस चुप्पी बची है.

कवि लड़की को देखते देखते मुस्कुराता है.
लड़की उदास है,
शायद कविताओं के ख़त्म हो जाने से या रात के बीत जाने से.

लड़की उठती है,
उसे जाना है.
"कुछ देर और नहीं रुक सकती?"
कवि पूछता है.

'रात तुम्हारी थी, वो बीत गयी"
लड़की कहती है और अपना पर्स उठाती है.

कवि मुस्कुराता है,
एक अकेली, उदास मुस्कान.
उसे पता था, सुबह तो होनी ही होती है.

लड़की मुडती है,
मुस्कुराने की कोशिश करती है.
कवि देख नहीं पाता,
वो नीचे देखने लगता है.

लड़की धीरे से बाहर निकल जाती है.

कवि उठता है,
और सब कविताएँ उठा कर पानी में डाल देता है.
नीली स्याही रेशा रेशा घुल कर शफ्फाक़ पानी में खो जाती है.

वो कविताएँ सिर्फ उस लड़की के लिए लिखी गयी थीं,
बाकी दुनिया का उन पर कोई हक़ नहीं बनता था...

Monday, 18 February 2019

व्याकरण

जीना एक क्रिया है,
ठीक वैसे ही जैसे मरना,

जिंदगी एक विशेषण है
ठीक वैसे ही जैसे प्रेम...

Saturday, 9 February 2019

शायद रुक जाओ तुम

तुम्हारे क़दम चूम लें हम
तब शायद रुक जाओ तुम,
ना बरबाद करना चाहो
हमारे लबों के गीले निशान,

कि गोल चक्कर लेती पृथ्वी
रुक गयी है
सुनने को आंसू तुम्हारे,

सिसकियाँ पढ़ के तुम्हारी
रात ज़िद पकड़ के बैठ गयी है
ना जाने की,
तुम बोल दो
तो शायद सुबह हो जाये,

नर्म उंगलियाँ तुम्हारी
पकड़कर
रख लें हम अपनी पलकों पर,
तब सहलाते हुए माथा मेरा
शायद रुक जाओ तुम...

Sunday, 27 January 2019

प्रेम का हिसाब

गीली सफ़ेद बर्फ से लिपटे चिनारों के चेहरे
खरगोश की आँखों जैसे मुंदे पड़े थे,
उतने ही लुभावने
जितना वो सेब रहा होगा जिसे हव्वा ने खाया था,
लाल चमकता अकेलापन
या
अभी शाम को झरी मुरझाई सूखी पत्तियाँ,
और सन्नाटा चीख चीख कर जाने किसे बुला रहा था

पीली अंधियारी रोशनी,
और बारिश की नम बूँदें,
और शोर मचाती हवा,
और वो आम जैसा बादल का टुकड़ा,
ऐसा क्यों है कि तुम्हारे चेहरे के ही हिस्से लगते हैं सब

रेगिस्तान में कोई नहर जैसे,
या बच्चों के रंगीन गुब्बारे,
या फांसी का फंदा लिए खड़ा जल्लाद कोई,
जगह ही जगह है पन्ने के दोनों तरफ.
और हाशिये में लिखे दो शब्द,
क़त्ल कर दिए जायें अगर ये सब
तब भी जो बचा रहता है वो तुम हो

रोना क्या है,
क्या वही जो हँसी और धुएं के बीच की खाली जगह में पनपता है?
अगर गणित में से निकाल दिया जाये जोड़-घटाव
तो जो बचता है वो क्या है?

दरअसल वो तुम हो,
एक हथेली भर मुस्कान लिए
हाथ बढ़ाती हुयी,

हाँ शायद तुम ही हो

Saturday, 19 January 2019

आवारगी

उम्रें हैं कि पीछा छोड़ती नहीं,
आवारगी है कि बढती ही जाये है...

Sunday, 13 January 2019

तुम्हारी चिट्ठी

तुम्हारे हाथों की
नरमाई है तुम्हारी चिट्ठी में,
और थोड़ी सी खुशबू
आँसुओं की,

ढेर सारी मुस्कराहट भी
लिफाफे में छुपी है वहीँ,
खोलते ही कमरे में भर गयी है अभी अभी,

दूसरी लाइन में दो अक्षर खो से गए हैं
हमारे साथ की तरह,
शायद अलमारी में सहेजे होंगे कहीं तुमने,

मिल जाये तो साथ लेती आना
कि अब बेतरह याद आ रही है तुम्हारी...

Tuesday, 1 January 2019

सर्दी, धूप, चाय और... तुम

सुबह सुबह
तुम्हारे साथ
आती है गुलाबी सर्दी
चाय
और गुनगुनी धूप,

पता नहीं तुम्हें
धूप अच्छी लगती है
या धूप में तुम,
पूछा नहीं कभी
ज़रूरत भी नहीं लगती,

मुझे तो सब
बराबर पसंद हैं,
सर्दी, धूप, चाय और...
तुम.