रात ढलती है
और फ़िर दरवाज़े तक आ कर
एकदम से रुक जाती है,
हल्की सी बारिश
और बूंदों की छुअन
तुम्हारा स्वाद ले आते हैं होंठों पर...
वो लटें जो गीली सी थीं उस दिन,
आँखें जो छुप छुप कर देखती थीं आँखों को,
उंगलियाँ जो बस एक मौके की तलाश में थीं,
अब हर बारिश में आ कर परेशान करती हैं
खिड़की पे सर टिकाये बैठे देखती रहती हैं मुझे,
वक़्त-बेवक़्त तुम्हारा ज़िक्र छेड़ देती हैं
और फिर मेरे सिरहाने बैठ कर लबों पे बिखेर देती हैं
तुम्हारी खुशबू का इत्र,
चेहरे पर ढल जाती हैं ख़्वाबों की तरह
और समंदर कर देती हैं मेरी नींदों को,
कभी कभी सोचता हूँ कि
पी जाऊं तुम्हे पूरा का पूरा,
अंजुरियों में भर कर,
मगर फ़िर ख़याल आता है कि बारिशों को कौन पी पाया है भला आज तक...
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