Saturday, 15 July 2017

तुम

दूर तक छाँव
धूप की मीनारों की,
कतरों की, बूंदों की
अंधेरे की दीवारों की,

यादों के दरख़्त
आँखें उनमें गुम,
तस्वीरों के जंगल
और उनके बीच
सिर्फ तुम...

इत्र

मौसम-ए-हिज्र में बस एक पल छू भर लिया था लबों को,
उनके ज़िस्म की खुशबू फिर सदियों तक हमसे मिटाई ना गयी...

Saturday, 25 February 2017

शर्म

ये सारे जहां की शर्म सिर्फ हम उठा कर क्या करेंगें जानां
काश थोड़ी सी शर्म इस शर्म को भी आती....

Tuesday, 24 January 2017

अहमक

भाषा से बेदख़ल किये शब्दों से नये प्रतिमान गढ़ता हूँ,
मैं वो अहमक हूँ जो आईना देखकर मर्सिया पढ़ता हूँ...