Sunday, 14 August 2016

माओ ने कहा था

माओ ने कहा था
सत्ता का रास्ता बन्दूक की नली से निकलता है,
चिरी हुयी गर्दनों
और सूनी आँखों वाली लाशों के ऊपर
पैर रख कर चढ़ी जाती हैं सत्ता की सीढ़ियाँ,

माओ शायद कहना भूल गया
कि लाशें कुर्सियों पर नहीं बैठ सकतीं,
चिरी हुयी गर्दनें भाषण नहीं दे सकतीं
अकड़ी जबानें रोटी नहीं खा सकतीं नमक के साथ भी,

और जो पहुँच जाते हैं सत्ता तक
बन्दूक की नली के रास्ते,
उनका चश्मा बन जाती है बन्दूक की नली
हाथ, पैर और ज़बान बन कर
बरसने लगती हैं आदिवासियों और दलितों पर,

वो नलियाँ खेतों में बोई जाती हैं
सींचा जाता है ज़हरीले लफ़्ज़ों से उन्हें
और वक़्त आने पर काटी जाती है नयी बंदूकों की फसल,
आवाम बड़े चाव से खाती है उन्हें,

किताबों में अक्षर बना कर ढाला जाता है इस फसल का मांड़
और पिलाया जाता है दुधमुँहों को घोल कर,
बड़े हो कर उगलते हैं वे बंदूकें
और किसी माओ के लिए उनकी नलियों से सत्ता का रास्ता निकालते हैं...

Tuesday, 9 August 2016

इलहाम


लफ्ज़
भीगे से
गिरते हैं बारिश की मानिंद,

एक बुलबुल वो जो बैठी है सदियों की प्यास लिए
परछाइयों के पीछे छुप कर 
चुगती है शब्द,

दोपहरें काली हो गयी हैं
और रातें सारी सफ़ेद
ज़ेब्रा क्रॉसिंग पहुँच गयी है चलते चलते चाँद तक,

इमली के जंगल गुम हैं जेबों में
नावें सारी छतों पे लटकी सूख रही हैं
समेत कर अचार-पापड़ बना लेगी कोई माँ एक,

पीली घुप्प रोशनी और कत्थई आँखे
घूरती हैं दीवारों से चिपकी नंगी छातियों को
दो टांगों के बीच मस्जिद की मीनार अज़ान पढ़ रही है,

कुर्सियां उठ कर दौड़ रही हैं सड़कों पर 
किताबों का क़त्ल-ए-आम जारी है बेतकल्लुफ़
ज़बानें सारी लहूलुहान बारिश में मुंह छिपाए बैठी हैं भीगते हुए।