(आलोक धन्वा की कविता ‘भागी हुयी लड़कियाँ’ से प्रेरित)
लड़कियाँ जो घर से भाग जाती हैं,
मिलती हैं रसोइयों में,
छह बाई चार के सीलन भरे कमरों में
मर्दों की बाहों में
सिमटी हुयी, लाड़ जताती हुयी,
भागी हुयी लड़कियाँ
बदनाम गलियों में मिलती हैं
दूसरों से ईनाम में मिली बीमारियाँ ले कर
मरती हुयी,
सपाट चेहरों पर मेक-अप का पलस्तर लगा कर
टाँगे खोले हुए,
कभी कभी वो
शीशे की खिडकियों वाली बहुमंजिली इमारतों
में बने केबिनों में भी मिलती हैं,
आदेश देती और मर्दों पर चिल्लाती हुयी,
जिनके पीठ पीछे लोग उन्हें,
‘साली कुतिया’ कह कर मुँह बिचकाते हैं,
भागी हुयी लड़कियाँ
सड़क किनारे खंतियों में भी मिलती हैं,
चिरी गर्दन लिए
जीभ बाहर निकाले
लुटी-पिटी हुयी।
भागी हुयी लड़कियों का कोई घर नहीं होता
वो भागती रहती
हैं इस घर से उस घर
भागी हुयी
लड़की होने की तोहमत लिए।
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