Sunday, 17 July 2016

सड़क के बीच पड़ी पीली लाइन

दूर सड़क के आखिरी छोर तक
जो पीली लाइन चली जा रही है
सड़क के बीचों-बीच,

सुबह तक उसके ऊपर दौड़ रही थीं गाड़ियाँ
कुचलती हुयी पहियों से,
दसों उंगलियों में अंगूठियाँ पहने रईस,
सोने की ज़री के काम वाली साड़ियाँ लपेटे अघाई औरतें
साफ़ धुली कमीजें पहने गोरे-चिट्टे बच्चे
हाथों में हाथ डाले युगल,

अँधेरा घिरते ही अकेले पड़ गयी है लाइन
फुटपाथ के किनारे सोते बेघरों सी
हाँ, शायद बेघर ही तो है,
लैंप पोस्ट और मोड़ों की तरह उसका कोई ठिकाना नहीं,
ना उस पर कोई टांग उठा कर मूतने वाला है
ना चाय की टपरी पर बैठ कर गप्पें मरने वाले,

उसके हिस्से का आसमान भी खा गयी है मेट्रो
चाँद के सहारे कटती थी रात जो,
अब मेट्रो की धकड़ धकड़ में कट जाती है,

आज रात बारिश होगी शायद,
किनारे सोये पड़े अनाथों की तरह
उसे भी भागना पड़ेगा
सर छुपाना पड़ेगा किसी दूकान के बाहर

और लौट कर आना पड़ेगा सुबह फिर,
कुचले जाने को|

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