Sunday, 31 July 2016

शादी के बाहर प्रेम



हाँ शादी के बाहर होता है प्रेम,
और अक्सर शादी के बाहर ही होता है,
कहते हैं कि जोड़ियाँ बनती हैं आसमान में
शायद आसमान को कभी प्रेम नहीं हुआ होगा,

शादियाँ होती हैं इंसानों में
और प्रेम भूखों में,

हवस के भूखो में
सहानुभूति के भूखो में
अपनापा, नरमी, वहशीपन,
हिंसा, दया, जंगलीपन के भूखों में,

क्योंकि भूख का एक ही इलाज बना है आज तक
तृप्ति
और प्रेम रास्ता है तृप्ति का

Thursday, 28 July 2016

लड़कियाँ जो घर से भाग जाती हैं...


(आलोक धन्वा की कविता ‘भागी हुयी लड़कियाँ’ से प्रेरित)

 
लड़कियाँ जो घर से भाग जाती हैं,
मिलती हैं रसोइयों में,
छह बाई चार के सीलन भरे कमरों में
मर्दों की बाहों में
सिमटी हुयी, लाड़ जताती हुयी,

भागी हुयी लड़कियाँ
बदनाम गलियों में मिलती हैं
दूसरों से ईनाम में मिली बीमारियाँ ले कर
मरती हुयी,
सपाट चेहरों पर मेक-अप का पलस्तर लगा कर
टाँगे खोले हुए,

कभी कभी वो
शीशे की खिडकियों वाली बहुमंजिली इमारतों
में बने केबिनों में भी मिलती हैं,
आदेश देती और मर्दों पर चिल्लाती हुयी,
जिनके पीठ पीछे लोग उन्हें,
‘साली कुतिया’ कह कर मुँह बिचकाते हैं,
भागी हुयी लड़कियाँ
सड़क किनारे खंतियों में भी मिलती हैं,
चिरी गर्दन लिए
जीभ बाहर निकाले
लुटी-पिटी हुयी

भागी हुयी लड़कियों का कोई घर नहीं होता
वो भागती रहती हैं इस घर से उस घर
भागी हुयी लड़की होने की तोहमत लिए

Sunday, 17 July 2016

सड़क के बीच पड़ी पीली लाइन

दूर सड़क के आखिरी छोर तक
जो पीली लाइन चली जा रही है
सड़क के बीचों-बीच,

सुबह तक उसके ऊपर दौड़ रही थीं गाड़ियाँ
कुचलती हुयी पहियों से,
दसों उंगलियों में अंगूठियाँ पहने रईस,
सोने की ज़री के काम वाली साड़ियाँ लपेटे अघाई औरतें
साफ़ धुली कमीजें पहने गोरे-चिट्टे बच्चे
हाथों में हाथ डाले युगल,

अँधेरा घिरते ही अकेले पड़ गयी है लाइन
फुटपाथ के किनारे सोते बेघरों सी
हाँ, शायद बेघर ही तो है,
लैंप पोस्ट और मोड़ों की तरह उसका कोई ठिकाना नहीं,
ना उस पर कोई टांग उठा कर मूतने वाला है
ना चाय की टपरी पर बैठ कर गप्पें मरने वाले,

उसके हिस्से का आसमान भी खा गयी है मेट्रो
चाँद के सहारे कटती थी रात जो,
अब मेट्रो की धकड़ धकड़ में कट जाती है,

आज रात बारिश होगी शायद,
किनारे सोये पड़े अनाथों की तरह
उसे भी भागना पड़ेगा
सर छुपाना पड़ेगा किसी दूकान के बाहर

और लौट कर आना पड़ेगा सुबह फिर,
कुचले जाने को|

Friday, 8 July 2016

चुप्पी

आज चुप हूँ किसी वज़ह से
अब से ख़ामोशी है मेरी ज़बान,
कोई तुक नहीं बनता सन्नाटो के चीखने का

शब्द कर रहे हों आत्महत्या जब।

Wednesday, 6 July 2016

दीवारें

वो दीवारें जिनके दरमियान घर होते हैं,
अक्सर छूट जाती हैं,
और मिलती हैं सूनी दीवारें हर बार...

हम सजाते हैं सफ़ेद चपटी सतहें ,
बनाते हैं घर उन खाली दीवारों से,
और जब आने लगती है उनमें घर जैसी खुशबू,
तब फिर छोड़नी पड़ती हैं वो दीवारें...