Wednesday, 22 June 2016

युद्धभूमि

सुरसा सा मुँह बाए
खड़ी है युद्धभूमि
इस तरफ ताकती हुयी,

ढेर की ढेर लाशें जा चुकी हैं पेट में
मगर प्यासी जबान तलाश रही है बस्तियाँ
वहाँ जहाँ सपनो की फसलें बोई जा रही हैं रोटियों के खेत में,


तलवारों की नयी ईंटें पाथ कर
उन्हें खून में रंगना चाहता है
युद्धभूमि में खड़ा वो बिजूका,

जेबों में हीरे भरे
हाथों में पत्थर लिए
उम्मीद भरी मुस्कान फेंकता गुज़रता है गलियों से,

विकास के नारे लगाता
ललचाई चोर नजरों से पिंजर नापता
छपा है दीवारों पे,

उसके साथ चलता हर रास्ता
जाता है युद्धभूमि तक
लाशों का एक और ढेर बनाने।

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