Tuesday, 5 January 2016

क़त्ल और इश्क़

क़त्ल करने से ज़्यादा मुश्क़िल है इश्क़ करना...
माने ये कि क़त्ल करने को पल भर की हिम्मत चाहिए और इश्क़ मांगता है दिन, महीने, बरस.... स्याह रातें घुट घुट के तितली के कंकाल जैसी हो जाती हैं, धुंआ अंदर लेना सांस लेने से ज़्यादा आसान लगता है। पत्तियाँ झरने लगती हैं जिस्म के तमाम दरख़्तों की..... समंदर सूख जाता है हथेलियों से बह कर।
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क़त्ल करने में बाल्टी भर खून निकलता है और इश्क़ बूँद बूँद निकालता है ...... जिस दिन व्हिस्की गिलास में सूख जाये उस दिन समझो कि इश्क़ हुआ।

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