Thursday, 28 January 2016

रात

ना जाओ आज कि यूँ ही रात गुज़र जाने दो,
मेरे गेसुओं से खेलो कि इन्हें अपने चेहरे पे बिखर जाने दो ....
ना जाओ आज कि यूँ ही रात गुज़र जाने दो ...

मेरे पहलू में बैठे रहो यूँ ही कि जज़्बात जाएँ जिधर जाने दो ....
ना जाओ आज कि यूँ ही रात गुज़र जाने दो ...

इश्क़ की उस हद तक जाएँ हम कि कोई हद ही ना रहे,
मुझे आगोश में लो कि जाये जहाँ तक ये सफर जाने दो ....

मुझे कतरा-कतरा देखो और समझो तुम,
कि आँखे बंद करो और जाये जहाँ तक नजर जाने दो .....
ना जाओ आज कि यूँ ही रात गुजर जाने दो....

पहली बार मोहब्बत की है मैंने किसी से इस क़दर,
कि अब मेरे जिस्म के हर हिस्से तक इसका असर आने दो....

तुमसे मिल कर और खूबसूरत हुई है मेरी ज़िंदगी,
कि आज की रात इसे जन्नत बनने तक संवर जाने दो ....
ना जाओ आज कि यूँ ही रात गुज़र जाने दो....
ना जाओ आज कि यूँ ही रात गुज़र जाने दो....
सारी अलमारियां देख लीं और सारी दराजें भी, मगर उदासी को रखने के लिए मेरे पास कहीं भी जगह नहीं थी।
सब कुछ भरा पड़ा था तन्हाइयों से और मसरूफ़ियत से। 
कुछ पुरानी चिट्ठियों में थोड़ी सी जगह मिली तो एक टुकड़ा उदासी उनमें छुपा दी और बाकी की उदासी एक गमले में रोप दी। अब एक पौधा लहलहा रहा है मेरे छज्जे पर जिसमें छोटे-छोटे फल लगे हुए हैं उदासी के। 
सोच रहा हूँ कि इनका क्या किया जाए !

Tuesday, 5 January 2016

क़त्ल और इश्क़

क़त्ल करने से ज़्यादा मुश्क़िल है इश्क़ करना...
माने ये कि क़त्ल करने को पल भर की हिम्मत चाहिए और इश्क़ मांगता है दिन, महीने, बरस.... स्याह रातें घुट घुट के तितली के कंकाल जैसी हो जाती हैं, धुंआ अंदर लेना सांस लेने से ज़्यादा आसान लगता है। पत्तियाँ झरने लगती हैं जिस्म के तमाम दरख़्तों की..... समंदर सूख जाता है हथेलियों से बह कर।
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क़त्ल करने में बाल्टी भर खून निकलता है और इश्क़ बूँद बूँद निकालता है ...... जिस दिन व्हिस्की गिलास में सूख जाये उस दिन समझो कि इश्क़ हुआ।