Wednesday, 21 October 2015

माचिस की डिब्बियों में क़ैद वक्त.....

कैद है वक्त
माचिस की पीली डिब्बियों में,
रगड़ रगड़ कर तीलियों से
जल रहा है
तपता सूरज एक,
तमाम हो रहा है हौले हौले वक्त
ढेर का ढेर...
.
और भाग रही है दुनिया सारी
उस वक्त के पीछे
जो क़ैद है डिब्बियों में,
.
अंधेरा ब्लैक-होल सा है डिब्बियों के अंदर
वक्त बेचारा बेबस
पटकता है हाथ पाँव
डिबिया की दीवारों पे,
कोई नहीं सुनता वक्त की
रहता है क़ैद अपनी ही बनाई
माचिस की डिब्बियों में...

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