Sunday, 25 October 2015

गुलाबों के दरमियाँ....

हवा में से खुशबू निकल जाती है
तो बचती है कड़वाहट
नीम के पत्तों की
.
मगर जो पलते हैं
धतूरे पर
वो रहते हैं ग़ाफ़िल
गुलाबों के दरमियाँ भी
और उनकी सारी हवा
कड़वी ही रहती है....

Wednesday, 21 October 2015

माचिस की डिब्बियों में क़ैद वक्त.....

कैद है वक्त
माचिस की पीली डिब्बियों में,
रगड़ रगड़ कर तीलियों से
जल रहा है
तपता सूरज एक,
तमाम हो रहा है हौले हौले वक्त
ढेर का ढेर...
.
और भाग रही है दुनिया सारी
उस वक्त के पीछे
जो क़ैद है डिब्बियों में,
.
अंधेरा ब्लैक-होल सा है डिब्बियों के अंदर
वक्त बेचारा बेबस
पटकता है हाथ पाँव
डिबिया की दीवारों पे,
कोई नहीं सुनता वक्त की
रहता है क़ैद अपनी ही बनाई
माचिस की डिब्बियों में...

चाँद और व्हिस्की

उनींदी रातों में
पत्थर मार कर 
तोड़ लेते हैं ठंडे चाँद को
और
उसके टुकड़ों को ग्लास में डाल लेते हैं,
.
बर्फ की तरह पिघलता है मन
चमकीली सी व्हिस्की में
और जहाँ दूर आसमान के हवाईजहाज सा
हिलता हुआ लगता है,
.
रात जितनी आगे बढ़ती है
यादें उतनी ही पीछे
और
हाथ उठा कर आँसू पोंछ देता है
दिल में बैठा हुआ बच्चा सा....