फिलहाल तो फिल्म एवं टेलीविज़न इंस्टिट्यूट ऑफ़ इंडिया के छात्र की पहचान के साथ जी रहा हूँ। उसके अलावा पटकथा लेखक, कवि, फ़िल्मकार जैसी कुछ शब्दों में सिमट सकने वाली और पहचानें हैं।
भाई, दोस्त, बेटे जैसी कुछ और पहचानें जोड़ ली जाएँ तो इतनी पहचानें हैं कि कभी कभी मैं खुद को भी नहीं पहचान पाता।
Friday, 25 September 2015
बचपन
आज घर बैठ कर सुकूँ की एक रोटी भी तोड़ी नहीं जाती,
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बचपन में इतनी फुर्सत थी की आसमां पे चढ़ कर सितारे तोड़ लिया करते थे...
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