Friday, 25 September 2015

बचपन- 2

एक अरसा हो गया नीचे उतर कर मिट्टी में खेले हुए,
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बचपन में तो मिट्टी से ही महल बना लिया करते थे..

बचपन

आज घर बैठ कर सुकूँ की एक रोटी भी तोड़ी नहीं जाती,
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बचपन में इतनी फुर्सत थी की आसमां पे चढ़ कर सितारे तोड़ लिया करते थे...
सारी उमर निकल गयी दौलत कमाने में,
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अब दौलत ले कर बैठे हैं उमर की ख्वाहिश में...

Wednesday, 9 September 2015

दो मुक्तक

तू मुझे शराबी ना कह ऐ दोस्त
मुझे तो फ़कत मय का नाम आता है,
मुझसे बड़ा शराबी तो वो खुदा खुद है,
जो इस मयखाने में हर शाम आता है ....
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तू पैमाने की माप मत देख ऐ दोस्त
ये देख की पैमाने में कितना जाम आता है,
और ये न देख कि हम तो सिर्फ गुज़रे ही हैं मयखाने से,
ये देख कि हम पे अब कितना इल्ज़ाम आता है...