बहते वक्त को अंजुरी में भर लेता है रात का समंदर... जो पेड़ इश्क की पहली बारिश में लगाया था उसकी सिसकियाँ उजालों में भूतों की तरह डराती हैं...
रेगिस्तान की रेत में पानी समंदर भर... बसंती दुपट्टे में बने वो लाल फूल रात भर बारिश की तरह बरसे थे...
अहसास की हरी बेलें... पानी में लाल रंग मिलाकर लिखी जाती कविताएं...
चाँद का एक कंचे बराबर टुकड़ा मेरी जेब में...
मेंहदी भरे हाथों में कच्चे आम... तुम्हारा दुख मेरे हाथों को चूम कर रोया है...
आसमान में नींद की पतंगें तुम्हारी आवाज़ के झोंकों के साथ उड़ी जा रही हैं... प्यार के कैनवस पर छुअन, गंध, नम होठों का स्वाद...
तुलसी के गमलों मे गिरी कागज़ की नावें... कोई तुम्हारे नाम को गीत बना चुका था...
चूल्हे से उठते धुएं में ताज़ी पकी रोटी की मृगतृष्णा... और ज़िन्दा हो जाती हैं गुलाबी रिबन में लिपटी आकांक्षाएं...
भूख की उदास आँखों में नमक का कसैलापन...अब रात को किसी टूटे हुए दिल की आह सुनाई नहीं देती...
किशोर चेहरे को अब शहद के रंग की आँखों वाली किसी लड़की की नज़र नहीं लगेगी...
No comments:
Post a Comment