Wednesday, 11 November 2015

बरसात

बरसा था समंदर रात भर
मेरे बिस्तर पर
सहर तक आ गयी थी बाढ़,
हाथ पकड़ कर तुम्हारा
उकडू बैठा रहा था मैं
घुटनो तक पानी में,
मछलियाँ खाई थीं हमने
आँखों में डुबा कर,
.
नमकीन सी लहरों में जो
नमकीन से आंसू
तुमने डुबा कर मार दिए थे,
सुबह सीपियाँ बन कर
किनारे पड़े थे,
.
बिस्तर के नीचे जूते
सूखे पड़े हुए थे
जाने क्यों चुपचाप से रूठ कर,
शायद भीगने से डरते होंगे,
.
गीले कांच के आईने में
तुम्हारी क्लिप
टाइटैनिक जैसी चली जा रही थी,
मेरी कंघियों की शार्क पीछे पीछे थी
.
मेरी उंगलियों को
नहीं आता था तैरना,
वो टुकुर टुकुर एक दुसरे को देखती
रोने लगी थीं,
तब तुम्हारी उंगलियों ने उन्हें
तैरना सिखाया था,
.
तकियों की किश्तियों में
चादर के जाल डाले
पकड़ी थीं हमने
शैतानियाँ
उस रात,
जिस रात बरसा था समंदर रात भर
मेरे बिस्तर पर....

Sunday, 25 October 2015

गुलाबों के दरमियाँ....

हवा में से खुशबू निकल जाती है
तो बचती है कड़वाहट
नीम के पत्तों की
.
मगर जो पलते हैं
धतूरे पर
वो रहते हैं ग़ाफ़िल
गुलाबों के दरमियाँ भी
और उनकी सारी हवा
कड़वी ही रहती है....

Wednesday, 21 October 2015

माचिस की डिब्बियों में क़ैद वक्त.....

कैद है वक्त
माचिस की पीली डिब्बियों में,
रगड़ रगड़ कर तीलियों से
जल रहा है
तपता सूरज एक,
तमाम हो रहा है हौले हौले वक्त
ढेर का ढेर...
.
और भाग रही है दुनिया सारी
उस वक्त के पीछे
जो क़ैद है डिब्बियों में,
.
अंधेरा ब्लैक-होल सा है डिब्बियों के अंदर
वक्त बेचारा बेबस
पटकता है हाथ पाँव
डिबिया की दीवारों पे,
कोई नहीं सुनता वक्त की
रहता है क़ैद अपनी ही बनाई
माचिस की डिब्बियों में...

चाँद और व्हिस्की

उनींदी रातों में
पत्थर मार कर 
तोड़ लेते हैं ठंडे चाँद को
और
उसके टुकड़ों को ग्लास में डाल लेते हैं,
.
बर्फ की तरह पिघलता है मन
चमकीली सी व्हिस्की में
और जहाँ दूर आसमान के हवाईजहाज सा
हिलता हुआ लगता है,
.
रात जितनी आगे बढ़ती है
यादें उतनी ही पीछे
और
हाथ उठा कर आँसू पोंछ देता है
दिल में बैठा हुआ बच्चा सा....

Friday, 25 September 2015

बचपन- 2

एक अरसा हो गया नीचे उतर कर मिट्टी में खेले हुए,
.
बचपन में तो मिट्टी से ही महल बना लिया करते थे..

बचपन

आज घर बैठ कर सुकूँ की एक रोटी भी तोड़ी नहीं जाती,
.
बचपन में इतनी फुर्सत थी की आसमां पे चढ़ कर सितारे तोड़ लिया करते थे...
सारी उमर निकल गयी दौलत कमाने में,
.
अब दौलत ले कर बैठे हैं उमर की ख्वाहिश में...

Wednesday, 9 September 2015

दो मुक्तक

तू मुझे शराबी ना कह ऐ दोस्त
मुझे तो फ़कत मय का नाम आता है,
मुझसे बड़ा शराबी तो वो खुदा खुद है,
जो इस मयखाने में हर शाम आता है ....
.
तू पैमाने की माप मत देख ऐ दोस्त
ये देख की पैमाने में कितना जाम आता है,
और ये न देख कि हम तो सिर्फ गुज़रे ही हैं मयखाने से,
ये देख कि हम पे अब कितना इल्ज़ाम आता है...

Saturday, 22 August 2015

साँझ ढले तेरी यादों ने फिर मुझसे बातें कीं

साँझ ढले तेरी यादों ने फिर मुझसे बातें कीं
हँसी मुस्कुराई और तन्हाई में मुलाक़ातें कीं,
कुछ झूठे नखरे दिखाए
कुछ सच्ची तारीफें कीं,
कुछ प्यारे बहाने बनाये
और कुछ नीची आँखें कीं,
साँझ ढले तेरी यादों ने फिर मुझसे बातें कीं...
.
सब कुछ कह गयीं
और कुछ भी ना कहा,
कुछ भी बोली नहीं
और कुछ बाकी ना रहा,
सूरज भी डूबा नहीं और गहरी रातें कीं,
साँझ ढले तेरी यादों ने फिर मुझसे बातें कीं...
.
तेरी याद दिलाई
और तेरी कसमें भी,
कुछ वादे जो हैं किये
और निभानी जो रस्में भी,
थोड़ा हँसी और फिर
आँसुओं की बरसातें कीं,
साँझ ढले तेरी यादों ने फिर मुझसे बातें कीं...
साँझ ढले तेरी यादों ने फिर मुझसे बातें कीं....

Tuesday, 18 August 2015

स्वप्नद्रष्टा



संबंधो का गूढ़ रहस्य
आच्छादित मन
विलोड़ित आकांक्षाएँ
द्रोही दृष्टिकोण
खंडित परंपराएँ
अंतहीन मार्ग
कंटकबिंधित देह
रक्तरंजित स्वप्न
स्नेहित शूल
लयबद्ध प्रहार व्यथित आत्मा पर
.
स्वप्नद्रष्टा का जीवन
शूल पर टिकी देह.....

Monday, 17 August 2015

कल - आज


                                                           
बहते वक्त को अंजुरी में भर लेता है रात का समंदर... जो पेड़ इश्क की पहली बारिश में लगाया था उसकी सिसकियाँ उजालों में भूतों की तरह डराती हैं...
रेगिस्तान की रेत में पानी समंदर भर... बसंती दुपट्टे में बने वो लाल फूल रात भर बारिश की तरह बरसे थे...
अहसास की हरी बेलें... पानी में लाल रंग मिलाकर लिखी जाती कविताएं...
चाँद का एक कंचे बराबर टुकड़ा मेरी जेब में...
 मेंहदी भरे हाथों में कच्चे आम... तुम्हारा दुख मेरे हाथों को चूम कर रोया है...
आसमान में नींद की पतंगें तुम्हारी आवाज़ के झोंकों के साथ उड़ी जा रही हैं... प्यार के कैनवस पर छुअन, गंध, नम होठों का स्वाद...
तुलसी के गमलों मे गिरी कागज़ की नावें... कोई तुम्हारे नाम को गीत बना चुका था...
चूल्हे से उठते धुएं में ताज़ी पकी रोटी की मृगतृष्णा... और ज़िन्दा हो जाती हैं गुलाबी रिबन में लिपटी आकांक्षाएं...
भूख की उदास आँखों में नमक का कसैलापन...अब रात को किसी टूटे हुए दिल की आह सुनाई नहीं देती...
 किशोर चेहरे को अब शहद के रंग की आँखों वाली किसी लड़की की नज़र नहीं लगेगी...

The day after today