जीनी आम ज़िंदगी कहां इतनी आसान होती है
आदमी को डालनी हर दिन ख़तरे में जान होती है।
फिलहाल तो फिल्म एवं टेलीविज़न इंस्टिट्यूट ऑफ़ इंडिया के छात्र की पहचान के साथ जी रहा हूँ। उसके अलावा पटकथा लेखक, कवि, फ़िल्मकार जैसी कुछ शब्दों में सिमट सकने वाली और पहचानें हैं। भाई, दोस्त, बेटे जैसी कुछ और पहचानें जोड़ ली जाएँ तो इतनी पहचानें हैं कि कभी कभी मैं खुद को भी नहीं पहचान पाता।
तुम कहती हो कि मैं क्या हूँ?
और मैं कहता हूँ कि तुम तुम हो,
तुम्हें ज़रूरत नहीं कुछ और होने की.
जो कुछ हो जाते हैं वो खुद नहीं रहते,
और मुझे तुम तुम जैसी ही पसंद हो,
कुछ और जैसी नहीं.
तुम कहती हो कि मैं ऐसी हूँ और ऐसा तुम्हें नहीं चाहिए,
और मैं कहता हूँ कि मुझे तुम चाहिए
और जैसी हो वैसी ही चाहिए.
तुम कहती हो कि तुम्हारा भूगोल गलत है,
और मैं कहता हूँ कि तुम्हारा भूगोल
मेरे भूगोल को चाहिए,
और दोनों को साथ बैठ कर एक दूसरे की
असमानतायें गिननी चाहिए
और खुश होना चाहिए उन्हें मिलता देख कर.
तुम कहती हो कि तुम्हें बातें बनाना आता है
और मैं कहता हूँ कि तुम्हें मुझे बनाना आता है,
और मुझे बना कर तुम खुद कुछ देर के लिए जो बन जाती हो,
मुझे वही तुम चाहिये...