Monday, 9 June 2025

आम ज़िंदगी

 जीनी आम ज़िंदगी कहां इतनी आसान होती है

आदमी को डालनी हर दिन ख़तरे में जान होती है।

Wednesday, 30 December 2020

असमानताओं का भूगोल

 तुम कहती हो कि मैं क्या हूँ?

और मैं कहता हूँ कि तुम तुम हो,

तुम्हें ज़रूरत नहीं कुछ और होने की.

जो कुछ हो जाते हैं वो खुद नहीं रहते,

और मुझे तुम तुम जैसी ही पसंद हो,

कुछ और जैसी नहीं.


तुम कहती हो कि मैं ऐसी हूँ और ऐसा तुम्हें नहीं चाहिए,

और मैं कहता हूँ कि मुझे तुम चाहिए

और जैसी हो वैसी ही चाहिए.


तुम कहती हो कि तुम्हारा भूगोल गलत है,

और मैं कहता हूँ कि तुम्हारा भूगोल

मेरे भूगोल को चाहिए,

और दोनों को साथ बैठ कर एक दूसरे की

असमानतायें गिननी चाहिए

और खुश होना चाहिए उन्हें मिलता देख कर.


तुम कहती हो कि तुम्हें बातें बनाना आता है

और मैं कहता हूँ कि तुम्हें मुझे बनाना आता है,

और मुझे बना कर तुम खुद कुछ देर के लिए जो बन जाती हो,

मुझे वही तुम चाहिये...

Monday, 30 September 2019

जब आये तुम

आना तुम्हारा सर्दियों की धूप सा,
नरमी बन कर मेरे पोरों में समा जाना है...

आना तुम्हारा

तुम आई
शाम की तरह
चुपचाप, दबे पाँव
बिखर गयी आँगन में रात बन कर...

Tuesday, 20 August 2019

तुम

रात पानी बरसा मटके भर
बूँदें गिर रहीं थीं ढेरम-ढेर
जागा रहा मैं बाहर देखता सुबह तक...

रोशनी थी लकीर भर आसमान की
नमी, हवा, बिजली, शोर,
सब था

बस एक तुम नहीं थी...

Sunday, 14 April 2019

तुम्हारे हक़ की कविताएँ


सुबह हो चुकी है
और कविताएँ सब ख़तम,

अब कहने को कुछ नहीं रह गया है,
जो भी था
कविताओं में कहा जा चुका है,
अब बस चुप्पी बची है.

कवि लड़की को देखते देखते मुस्कुराता है.
लड़की उदास है,
शायद कविताओं के ख़त्म हो जाने से या रात के बीत जाने से.

लड़की उठती है,
उसे जाना है.
"कुछ देर और नहीं रुक सकती?"
कवि पूछता है.

'रात तुम्हारी थी, वो बीत गयी"
लड़की कहती है और अपना पर्स उठाती है.

कवि मुस्कुराता है,
एक अकेली, उदास मुस्कान.
उसे पता था, सुबह तो होनी ही होती है.

लड़की मुडती है,
मुस्कुराने की कोशिश करती है.
कवि देख नहीं पाता,
वो नीचे देखने लगता है.

लड़की धीरे से बाहर निकल जाती है.

कवि उठता है,
और सब कविताएँ उठा कर पानी में डाल देता है.
नीली स्याही रेशा रेशा घुल कर शफ्फाक़ पानी में खो जाती है.

वो कविताएँ सिर्फ उस लड़की के लिए लिखी गयी थीं,
बाकी दुनिया का उन पर कोई हक़ नहीं बनता था...

Monday, 18 February 2019

व्याकरण

जीना एक क्रिया है,
ठीक वैसे ही जैसे मरना,

जिंदगी एक विशेषण है
ठीक वैसे ही जैसे प्रेम...